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आठ स्त्रियां जिन्होंने रचा इतिहास

ये मील की पत्थर है, जिन्हें हम सभी स्त्रियां युग-युग तक गर्व से याद करेगी। प्रेरणास्त्रोत है ये स्त्रियां। साहित्य, समाज, कला और संस्कृति की अनमोल धरोहर है। सहज नहीं रहा इनका जीवन और न ही ये चांदी की चम्मच मुंह में लेकर जन्मीं। संघर्षो की ज्वाला में इनकी प्रतिभा निखरी और उतार-चढ़ावों भरे पथ की पथगामिनी रहीं ये सभी। 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर इन्हें याद करना प्रासंगिक होगा।
अपनी कूची से जादू बिखेरती थीं अमृता शेरगिल
महज 28 वर्ष की जिंदगी जीने वाली अमृता ने जो रचा, वह बेमिसाल रंगों का कोलाज है। 'यंग ग‌र्ल्स' जैसे जीवंत चित्रों को रचने वाली अमृता का जन्म 30 जनवरी 1913 को बुडापेस्ट में हुआ था। कला, संगीत व अभिनय बचपन से ही उनके साथी बन गए। 21वीं सदी की इस महान कलाकार को भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण में कला का अनमोल रत्न माना गया। सिख पिता उमराव सिंह शेरगिल और हंगरी मूल की यहूदी ओपेरा गायिका मां मेरी एंटोनी गोट्समन की यह संतान 8 वर्ष की आयु में पियानो-वायलिन बजाने के साथ-साथ कैनवस पर भी हाथ आजमाने लगी थी। 1921 में अमृता का परिवार समर हिल शिमला में आ बसा। बाद में अमृता की मां उन्हें लेकर इटली चली गई व फ्लोरेस के एक आर्ट स्कूल में उनका दाखिला करा दिया। उनकी प्रारंभिक पेंटिंग्स में पाश्चात्य प्रभाव व पेरिस के कुछ कलाकारों का प्रभाव साफ झलकता है। जल्दी ही वह भारत लौटीं और अपनी मृत्यु तक भारतीय कला परंपरा की पुन: खोज में जुटी रहीं। उन्हे मुगल व पहाड़ी कला सहित अजंता की विश्वविख्यात कला ने भी प्रेरित-प्रभावित किया। अमृता ने अपने हंगेरियन चचेरे भाई से विवाह किया 1938 में। फिर वह अपने पुश्तैनी घर गोरखपुर में आ बसीं। 1941 में अमृता अपने पति के साथ लाहौर चली गई, वहां उनकी पहली बड़ी एकल प्रदर्शनी होनी थी, किंतु एकाएक वह गंभीर रूप से बीमार पड़ीं और 6 दिसंबर 1941 को शून्य में विलीन हो गई।
नारी मुक्ति की पक्षधर सिमोन द बोउआर
(जन्म: 9 जनवरी 1908, मृत्यु : 14 अप्रैल 1986)
फ्रांसीसी लेखिका, दार्शनिक और 'द सेकंड सेक्स' जैसी महत्वपूर्ण पुस्तक लिखने वाली सिमोन का जन्म पेरिस में हुआ था। लड़कियों के लिए बने कैथलिक स्कूल में उनकी आरंभिक शिक्षा हुई। 'स्त्री पैदा नहीं होती, उसे बनाया जाता है।' सिमोन का मानना था कि स्त्रियोचित गुण दरअसल समाज व परिवार द्वारा लड़की में भरे जाते है, क्योंकि वह भी वैसे ही जन्म लेती है जैसे पुरुष और उसमें भी वे सभी क्षमताएं, इच्छाएं, गुण होते है जो कि लड़के में। सिमोन का बचपन शानदार बीता। लेकिन बाद के वर्षो में अभावग्रस्त जीवन भी उन्होंने जिया। 15 वर्ष की आयु में सिमोन ने निर्णय ले लिया कि वह एक लेखिका बनेंगी।
दर्शनशास्त्र, राजनीति और सामाजिक मुद्दे उनके पसंदीदा विषय थे। दर्शन की पढ़ाई करने के लिए उन्होंने पेरिस विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया, जहां उनकी भेंट बुद्धिजीवी ज्यां पॉल सा‌र्त्र से हुई। बाद में यह बौद्धिक संबंध आजीवन चला। 'द सेकंड सेक्स' का हिंदी अनुवाद 'स्त्री उपेक्षिता' भी काफी लोकप्रिय हुआ। 1970 में फ्रांस के स्त्री मुक्ति आंदोलन में सिमोन ने शिरकत की। स्त्री-अधिकारों सहित तमाम सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर सिमोन की भागीदारी समय-समय पर होती रही।
1973 का समय उनके लिए परेशानियों भरा था। सा‌र्त्र दृष्टिहीन हो गए थे। 1980 में सा‌र्त्र का देहांत हो गया। 1985-86 में सिमोन का स्वास्थ्य भी बहुत गिर गया था। निमोनिया या फिर पल्मोनरी एडोमा में खराबी के चलते उनका देहांत हो गया। सा‌र्त्र की कब्र के बगल में ही उन्हें भी दफनाया गया।
भारत कोकिला सरोजिनी नायडू
(जन्म: 13 फरवरी 1879, मृत्यु: 2 मार्च 1949 लखनऊ)
सरोजिनी चट्टोपाध्याय के रूप में हैदराबाद के एक बंगाली परिवार में जन्मी थीं सरोजिनी नायडू। उनके पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय वैज्ञानिक, दार्शनिक व शिक्षाविद थे। जबकि मां वरदा सुंदरी देवी कवयित्री थीं। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व कवयित्री सरोजिनी नायडू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली स्त्री अध्यक्ष थीं। साथ ही वह पहली स्त्री थीं जो उत्तर प्रदेश की राज्यपाल बनीं। स्वतंत्रता की लड़ाई में उन्होंने पूरी भागीदारी निभाई। महज 12 वर्ष की आयु में मद्रास विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने के कारण वह बहुत मशहूर हुई। 16 वर्ष की आयु में लंदन के किंग्स कॉलेज में उन्हें प्रवेश मिला। उर्दू, हिंदी, तेलुगु, अंग्रेजी, बांग्ला और फारसी भाषाएं जानने वाली सरोजिनी के प्रिय कवि पी.बी. शेली थे। 1905 में बंगाल विभाजन के समय उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया। 1915 से 1918 के बीच उन्होंने युवाओं के कल्याण, श्रम के मूल्य व राष्ट्रहित में स्त्रियों के योगदान को लेकर बहुत कार्य किए। चंपारन के कामगारों के बीच भी उन्होंने काम किया। 1920 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़ीं। 1928 में वह न्यूयॉर्क गई और अन्याय व असमानता के खिला़फ लड़ाई लड़ी। भारत लौटने के बाद वह कांग्रेस वर्किग कमेटी की सदस्य बन गई।
1930 में गांधी जी के जेल जाने के बाद उन्हे गिरफ्तार किया गया। कुछ महीने वह जेल में रहीं। 1942 में एक बार फिर भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वह 21 महीने तक जेल में रहीं। अंतत: 1947 में भारत के स्वतंत्र होने के बाद उन्हे उत्तर प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया।
निजी जिंदगी में महज 17 वर्ष की आयु में वह विजातीय डॉ. गोविंद राजुलु नायडू के प्रेम में गिरफ्तार हुई और 19 वर्ष की होने पर उन्होंने प्रेम विवाह किया। उनकी चार संतानें हुई और एक खुशहाल दांपत्य जीवन उन्होंने जिया।
द लेडी विद द लैंप फ्लोरेस नाइंटिगेल
(जन्म: 12 मई 1820, मृत्यु: 13 अगस्त 1910)
दया व सेवा की मिसाल फ्लोरेस नाइंटिगेल को 'द लेडी विद द लैंप' कहा गया। समृद्ध और उच्चवर्गीय ब्रिटिश परिवार में जन्मी फ्लोरेस ने सेवा की राह चुनी। 1845 में परिवार के तमाम विरोधों व क्रोध के बावजूद उन्होंने गरीबों की सेवा का व्रत लिया। दिसंबर 1844 में उन्होंने चिकित्सा सुविधाओं को बेहतर बनाने की मुहिम छेड़ी। इस दिशा में कानूनी संशोधनों की भी वकालत उन्होंने की। युवावस्था में वैवाहिक प्रस्ताव भी उन्हे मिले, पर फ्लोरेस ने उन्हे ठुकरा दिया। हालांकि बाद में रोम के प्रखर राजनेता सिडनी हर्बर्ट से उनकी मित्रता हुई। नर्सिग के अलावा लेखन और एप्लाइड स्टैटिस्टिक्स के क्षेत्र में भी उनका पूरा द़खल था। फ्लोरेस का सबसे महत्वपूर्ण योगदान क्रीमिया युद्ध में रहा। अक्टूबर 1854 में उन्होंने 38 स्त्रियों का एक दल घायलों की सेवा के लिए टर्की भेजा। इस समय किए गए उनके सेवा कार्यो के लिए ही उन्होंने 'लेडी विद द लैंप' के खिताब से नवाजा गया। वह सचमुच एक 'एंजेल' थी, जो घायलों-वंचितों को अपने एक स्पर्श व दिलासा के चंद शब्दों से जादुई असर पैदा कर देती थीं। जब डॉक्टर्स चले जाते तब वह रात के गहन अंधेरे में मोमबत्ती जलाकर घायलों की सेवा के लिए हाजिर हो जाती। लेकिन युद्ध में घायलों की सेवा सुश्रूषा के दौरान मिले गंभीर संक्रमण ने उन्हे जकड़ लिया था। 1859 में फ्लोरेस ने सेंट थॉमस हॉस्पिटल में एक नाइटिंगेल ट्रेनिंग स्कूल की स्थापना की। इसी बीच उन्होंने 'नोट्स ऑन नर्सिग' किताब लिखी। जीवन का बाकी समय उन्होंने नर्सिग के कार्य को बढ़ाने व इसे आधुनिक रूप देने में खपाया। 1869 में उन्हे महारानी विक्टोरिया ने 'रॉयल रेड क्रॉस' से सम्मानित किया। 90 वर्ष की आयु में 13 अगस्त 1910 को उनका निधन हो गया।
नृत्य में हवाओं से बात करती थीं इजाडोरा डंकन
(जन्म: 26 मई 1877, मृत्यु: 14 सितंबर 1927)
कैलिफोर्निया (यू.एस.) के सेन फ्रांसिस्को में जन्मी इजाडोरा को 'आधुनिक नृत्य की जन्मदायिनी' जैसे नाम से नवाजा गया है। नृत्य ही नहीं, जीवन में भी प्रयोगों की हिमायती इजाडोरा की आत्मकथा 'माय लाइफ' पढ़ने के बाद कला को समर्पित स्त्री के सभी पहलू उजागर होते हैं, साथ ही मन में प्रश्न उठता है, क्या कलाकार स्त्री एक सामान्य सहज जीवन नहीं जी सकती। इजाडोरा ने अपने समय से बहुत आगे जाकर जो प्रयोग किए, वह तत्कालीन समय के आलोचकों-कट्टरपंथियों को रास नहीं आए। इसके बावजूद इंग्लैंड के मशहूर नृत्य समीक्षक रिचर्ड ऑस्टिन ने माना कि वह विश्व की महानतम नृत्यांगनाओं में से एक थीं, जो खुद भी नहीं समझ पाती थी कि वह क्या नृत्य कर रही हैं।
उनके माता-पिता आइरिश मूल के थे, लेकिन वे अलग हो गए थे। मां संगीत जानती थीं और पियानोवादन ही उनकी आजीविका का साधन बना। अभावग्रस्त जीवन ने उन्हे पारंपरिक तौर पर शिक्षा-दीक्षा की मोहलत नहीं दी। इस तरह नृत्य उनकी अपनी मेहनत, क्षमताओं व आंतरिक अनुभूतियों की देन था। उनका सपना था-ऐसे नृत्य स्कूल की स्थापना करना जहां दुनिया भर के बच्चे प्रशिक्षण ले सकें, पर आर्थिक परेशानियों व शिष्याओं की बेरुखी ने उनका सपना पूरा नहीं होने दिया।
1913 में हुए एक हादसे में उन्होंने अपने दोनों बच्चों को खो दिया। इसके बाद उन्होंने फिर एक बच्चे को जन्म दिया, किंतु वह भी जन्म के कुछ देर बाद ही मर गया।
इन त्रासदियों ने इजाडोरा को भीतर तक हिला दिया। इस बीच उनका अपना स्वास्थ्य बहुत गिर गया। खुले हाथों खर्च करने वाली इजाडोरा अपने अंतिम दिनों में बहुत तंगहाली में रहीं। 14 दिसंबर 1927 को इजाडोरा ने जीवन की अंतिम सांसें लीं।
बुलंद हौसलों से लबरेज हेलन कैलर1 जून 1968)
अमेरिकी लेखिका, राजनीतिक कार्यकर्ता और प्रवक्ता हेलन कैलर पहली दृष्टिहीन व बहरी व्यक्ति थीं। जिन्होंने कला स्नातक की डिग्री हासिल की थी। सैन्य अधिकारी कैप्टन आर्थर एच. कैलर के घर जन्मीं थीं हेलन। कैलर परिवार मूल रूप से जर्मनी का था। वह एक स्वस्थ शिशु के रूप में ही जन्मी थीं। लगभग डेढ़ वर्ष आयु में उन्हे एक गंभीर बीमारी ने घेर लिया। यह मस्तिष्क ज्वर जैसी एक समस्या थी, जिसके कारण वह बहरी-अंधी हो गई। सात वर्ष की उम्र तक वह इशारों से ही अपनी बात लोगों को समझाती थीं। 1886 में उनके माता-पिता उन्हें एक मशहूर विशेषज्ञ को दिखाने ले गए। विशेषज्ञ ने उन्हे एलेक्जेंडर ग्राहम बेल से मिलवाया, जो तब गूंगे-बहरे बच्चों के लिए काम कर रहे थे। अंतत: दक्षिणी बोस्टन स्थित पर्किस स्कूल ऑफ ब्लाइंड में हेलन को एक मार्गदर्शक मिलीं ऐनी, जिन्होंने 1887 से उनके घर पर उन्हें विधिवत शिक्षा दी। यह शिक्षण कार्यक्रम बेहद कारगर रहा। कई वर्षो की मेहनत के बाद हेलन ब्रेललिपि में अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, ग्रीक और लैटिन जैसी भाषाओं में पारंगत हो गई। 1936 में ऐनी की मृत्यु के बाद हेलन और उनकी सेक्रेटरी थोंपसन ने दुनिया भर की यात्राएं कीं। ताकि दृष्टिहीनों की मदद के लिए आर्थिक कोष की स्थापना कर सकें। 1960 में थोंपसन की मृत्यु हो गई और एक नर्स विनी ने हेलन की देखभाल का जिम्मा लिया। वह अंतिम समय तक हेलन के साथ रहीं। हेलन ने मात्र 12 वर्ष की आयु में एक पुस्तक लिखी थी। 22 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी आत्मकथा 'द स्टोरी ऑफ माय लाइफ' लिखी। उन्होंने लगभग 12 किताबें लिखीं और जीवनपर्यत दृष्टिहीनों के लिए काम किया। सितंबर 1968 में उनकी मृत्यु हो गई।
इससे पूर्व 1964 में उनके योगदान के लिए उन्हें स्वतंत्रता के लिए दिए जाने वाले राष्ट्रपति पदक से सम्मानित किया गया। उन्हे बीसवीं सदी के महत्वपूर्ण लोगों की सूची में भी स्थान प्राप्त है।
साहित्य-समाज से जुड़ी वर्जिनिया वुल्फ
(जन्म: 1882, मृत्यु: 1941)
20वीं सदी की प्रतिभाशाली अंग्रेजी साहित्यकार व 'ए रूम ऑफ वन्स ओन' की लेखिका वर्जिनिया वुल्फ प्रसिद्ध लेखक, आलोचक और पर्वतारोही पिता सर स्टीफन और मां जूलिया स्टीफन की बेटी थीं। उनका जन्म 1882 में लंदन में हुआ था। बुद्धिजीवियों की आवाजाही उनके घर में होती रहती थी। जाहिर है वर्जिनिया का भी रुझान शुरू से ही लिखने-पढ़ने की ओर रहा। वर्जिनिया की अधिकतर स्मृतियां कॉर्नवाल की है, जहां वह अकसर गर्मी की छुट्िटयां बिताने जाती थीं। इन्हीं स्मृतियों की देन थी उनकी प्रमुख रचना-'टु द लाइटहाउस'। महज 13 वर्ष की थीं वह, जब उनकी मां का आकस्मिक निधन हो गया। इसके दो वर्ष बाद अपनी बहन व ं1904 में पिता को उन्होंने खो दिया। यह उनका अवसाद भरा दौर था। इसके बाद ताउम्र अवसाद के दौरे उन्हे घेरते रहे। बावजूद इसके उन्होंने कई महत्वपूर्ण कृतियों की रचना की। शारीरिक रूप से बहुत कमजोर होने के कारण उनकी पढ़ाई-लिखाई घर पर ही हुई। बाद में उन्होंने अध्यापन कार्य शुरू किया। 30 वर्ष की आयु में उन्होंने विवाह किया। उन्होंने डायरी, जीवनियां, उपन्यास, आलोचना सभी लिखे। लेकिन उनकी प्रिय विषयवस्तु स्त्री विमर्श ही थी। इसी का नतीजा थी, उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक 'ए रूम ऑफ वन्स ओन'। 1940 में द्वितीय विश्वयुद्ध में नाजियों के हमले के दौरान वुल्फ दंपती बहुत परेशान रहा करते थे, क्योंकि उनके पति लियोनार्ड यहूदी थे, जिनसे नाजी घृणा करते थे। इसी वर्ष बमबारी में उनका प्रेस नष्ट हो गया। अवसाद की स्थिति में उन्होंने नदी में छलांग लगा दी और जिंदगी खत्म कर दी।
आधुनिक मीरा महादेवी वर्मा
(जन्म: 24 मार्च 1907, मृत्यु: 11 सितंबर 1987)
हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर, आधुनिक मीरा कही जाने वाली छायावाद युगीन कवयित्री महादेवी वर्मा का जन्म वकीलों के एक परिवार में फर्रुखाबाद में हुआ था। जबलपुर (मप्र) में शिक्षा हुई। आधुनिक हिंदी कविता की जानी-मानी कवयित्री महादेवी का विवाह 1914 में महज 7 वर्ष की आयु में इंदौर के डॉ. स्वरूप नारायण वर्मा के साथ हो गया था। विवाहोपरांत जहां उनके पति ने लखनऊ से अपनी पढ़ाई जारी रखी, वहीं महादेवी ने 1929 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की। 1933 में संस्कृत में उन्होंने स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की। बचपन में हुई इस शादी को वह मन से नहीं स्वीकार सकीं और इलाहाबाद में ही रहीं। 1966 में पति की मृत्यु के बाद वह इलाहाबाद में स्थायी रूप से बस गई और अंतिम समय तक वहीं रहीं। बौद्ध धर्म से वह बहुत प्रभावित थीं। स्वतंत्रता-संग्राम की लड़ाई में उन्होंने समय-समय पर योगदान दिया। प्रयाग महिला विद्यापीठ में वह प्रधानाचार्या के पद पर रहीं। 'मैं नीर भरी दुख की बदली, उमड़ी कल थी मिट आज चली।' जैसी पंक्तियां लिखने वाली महादेवी वास्तव में विरह, पीड़ा व रहस्यवाद की कवयित्री थीं। साहित्य से इतर स्त्री अधिकारों की पक्षधर और सामाजिक सरोकारों से गहराई तक जुड़ी थीं वह। 'दीपशिखा' और 'यामा' उनकी प्रसिद्ध काव्य रचनाएं थी। 'यामा' के लिए उन्हे साहित्य का 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' प्राप्त हुआ। 1956 में उन्हे पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 1979 में साहित्य अकादमी फेलोशिप प्राप्त करने वाली वह पहली स्त्री थीं।
1988 में उन्हें पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। सितंबर 1987 की रात्रि उन्होंने इलाहाबाद स्थित अपने घर में अंतिम सांस ली। हिंदी साहित्य में उनका योगदान अमूल्य है।
आठ स्त्रियां जिन्होंने रचा इतिहास आठ स्त्रियां जिन्होंने रचा इतिहास Reviewed by NARESH THAKUR on Monday, September 23, 2013 Rating: 5

2 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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