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माता-पिता के लिए त्याग

अक्सर परिवार में बड़े ही बच्चों के लिए त्याग करते हैं। सफल जीवन वह है जिसमें संतानें अपने माता-पिता के लिए त्याग करना सीख जाएं। वो लोग सौभाग्यशाली होते हैं, जिनकी संतानें उनके लिए त्याग करती हैं। लेकिन ऐसी संतान पाने की कीमत भी चुकानी पड़ती है। जो लोग अपनी संतानों के लिए त्याग करना सीख जाते हैं, उन्हें संस्कार और योग्यता पाने के लिए उनका मोह छोड़ देते हैं, वे ही संतान का ये सुख देख पाते हैं। 

महाभारत में भीष्म के पिता शांतनु की कथा है। शांतनु को देव नदी गंगा से प्रेम हो गया। उन्होंने उससे विवाह कर लिया। अत्यंत सुंदर गंगा ने शांतनु के सामने ये शर्त रखी कि उसे अपने अनुसार काम करने की पूरी आजादी होनी चाहिए, जिस दिन शांतनु उन्हें किसी बात के लिए रोकेंगे, वो उन्हें छोड़कर चली जाएंगी। 

शांतनु ने शर्त मान ली। जब भी गंगा किसी संतान को जन्म देती, उसे तुरंत नदी में बहा देती। शांतनु उन्हें रोक नहीं पाते क्योंकि वे गंगा को खोने से डरते थे। जब सातवी संतान को भी गंगा नदी में बहाने आई तो शांतनु से रहा नहीं गया। उन्होंने गंगा को रोक कर पूछा कि वो अपनी संतानों को इस तरह नदी में बहा क्यों देती है। 

गंगा ने कहा आज आपने अपनी संतान के लिए मेरी शर्त को तोड़ दिया। अब ये संतान ही आपके पास रहेगी। शांतनु ने अपनी संतान को बचा लिया। लेकिन उसे अच्छी शिक्षा के लिए कुछ सालों के लिए गंगा के साथ ही छोड़ दिया। उस लड़के का नाम रखा गया देवव्रत। 

कुछ वर्षों बाद गंगा उसे लौटाने आईं। तब तक वह एक महान योद्धा और धर्मज्ञ बन चुका था। पुत्र के लिए शांतनु ने गंगा जैसी देवी का त्याग स्वीकार किया, उसी पुत्र को शिक्षा के लिए कई साल अपने से दूर भी रखा। इसी देवव्रत ने शांतनु का विवाह सत्यवती से करवाने के लिए आजीवन अविवाहित रहने की भीषण प्रतिज्ञा की थी। जिसके बाद इसका नाम भीष्म पड़ा। भीष्म ने ही आखिरी तक अपने पिता के वंश की रक्षा की।
माता-पिता के लिए त्याग माता-पिता के लिए त्याग Reviewed by NARESH THAKUR on Wednesday, March 14, 2012 Rating: 5

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